नज़्म – ईद (نظم – عید) गेस्ट पॉएट एजाज़ उल हक़ शिहाब

Sufi Ki Kalam Se

नज़्म – ईद (نظم – عید)

क़दम क़दम पे ये वहशत ये बढ़ती आहो फ़ुग़ाँ,
क़दम क़दम पे ये ग़ुरबत ये तुरबतों के निशाँ।
قدم قدم پہ یہ وحشت یہ بڑھتی آہ و فغاں،
قدم قدم پہ یہ غربت یہ تربطوں کے نشاں۔
क़दम क़दम पे ये हर मुफ़लिस ओ नादार का ग़म,
क़दम क़दम पे ये इंसानियत की हार का ग़म।
قدم قدم پہ یہ ہر مفلس و نادار کا غم،
قدم قدم پہ یہ انسانیت کی ہار کا غم۔
क़दम क़दम पे ये चीख़ें बिलखती माओं की
क़दम क़दम पे दिखे आह बेगुनाहों की।
قدم قدم پہ یہ چیخیں بلکتی ماؤں کی،
قدم قدم پہ دکھے آہ بیگناہوں کی۔
लहू बिखरता हुआ ख़ार ज़ार राहों पर,
हर एक चप्पे पे आसेब से भरे मंज़र।
لہو بکھرتا ہوا خار زار راہوں پر،
ہر ایک چپّے پہ آسیب سے بھرے منظر۔
बदन से ख़ून की बून्दों को चूसती हुई धूप,
दिखाई देता है कुदरत का उफ़ ये कैसा रूप।
بدن سے خون کی بوندوں کو چوستی ہوئی دھوپ،
دکھائی دیتا ہے قدرت کا اف یہ کیسا روپ۔
किसी की आँख में ख़्वाबों की मौत का ग़म है,
किसी के कांधे पे ख़ुद अपनी लाश का दम है।
کسی کی آنکھ میں خوابوں کی موت کا غم ہے،
کسی کے کاندھے پہ خود اپنی لاش کا دم ہے۔
किसी की रूह को देखो बदन से खींचती भूक,
किसी के बच्चों की हाय बिलखती चीख़ती भूक।
کسی کی روح کو دیکھو بدن سے کھینچتی بھوک،
کسی کے بچّوں کی ہائے بلکتی چیختی بھوک۔
ख़ुदा का क़हर बनी रहनुमाओं की ग़फ़लत,
ये रहबरों की नए परसाओं की ग़फ़लत।
خدا کا قہر بنی رہنماؤں کی غفلت،
یہ رہبروں کی نئے پارساؤں کی غفلت۔
हर एक लब पे मदद की गुहार है हाय,
सियासी ख़ेमों में बस इश्तेहार है हाय।
ہر ایک لب پہ مدد کی گہار ہے ہائے،
سیاسی خیموں میں پر اشتہار ہے ہائے۔
है कितना सख़्त ये वक़्ते सफ़र इलाही ख़ैर,
न जाने पहुंचें न पहुंचें ये घर इलाही ख़ैर।
ہے کتنا سخت یہ وقتِ سفر الٰہی خیر،
نہ جانے پہنچے نہ پہنچیں یہ گھر الٰہی خیر۔
कहाँ पे ले चला दौरे तरक़्क़ियात हमें
सहर की चाह में डसने लगी ये रात हमें,
کہاں پہ لے چلا دورِ ترقیات ہمیں،
سحر کی چاہ میں ڈسنے لگی ہے رات ہمیں۔
किसी के ज़ख़्म पे कैसे नमक लगाएं हम,
किसी के दर्द में कैसे ख़ुशी मनाएं हम।
کسی کے زخم پہ کیسے نمک لگائیں ہم،
کسی کے درد میں کیسے خوشی منائیں ہم۔
दिखाए जाती है उफ़ ज़िन्दगी घड़ी कैसी,
उफ़ ऐसे हाल में अब ईद की ख़ुशी कैसी।
دکھائے جاتی ہے اُف زندگی گھڑی کیسی،
اُف ایسے حال میں اب عید کی خوشی کیسی۔
किसी के ज़ख़्म की तमहीद किस तरह कर लें,
हम ऐसे हाल में अब ईद किस तरह कर लें।
کسی کے زخم کی تمہید کا طرح کر لیں،
ہم ایسے حال میں اب عید کس طرح کر لیں۔
हमें ही अब कोई सूरत निकालनी होगी,
हमें ही डूबती कश्ती संभालनी होगी।
ہمیں ہی اب کوئی صورت نکالنی ہوگی،
ہمیں ہی ڈوبتی کشتی سنبھالنی ہوگی۔
चलो के इक नई बुनियाद फिर से डालें हम,
चलो के आओ ये इंसानियत बचा लें हम।
چلو کہ اک نئی بُنیاد پھر سے ڈالیں ہم،
چلو کہ آؤ یہ انسانیت بچا لیں ہم۔
महब्बतों के उजालों को आओ फैलाएं,
चलो के ग़ुरबा ओ मिस्कीन की दुआ पाएं।
محبّتوں کے اُجالوں کو آؤ پھیلائیں،
چلو کہ غربا و مسکین کی دعا پائین۔
दुआ जो काम में आई ख़ुदा भी ख़ुश होगा
जो ऐसे ईद मनाई ख़ुदा भी ख़ुश होगा।
دعا جو کام میں آئی خدا بھی خوش ہوگا،
جو ایسے عید منائی خدا بھی خوش ہوگا۔

©️✍️एजाज़ उल हक़ शिहाब

⁦©️⁩⁦✍️⁩ اعجاز الحق شہاب

https://youtu.be/CWsLn5abHZo


Sufi Ki Kalam Se

4 thoughts on “नज़्म – ईद (نظم – عید) गेस्ट पॉएट एजाज़ उल हक़ शिहाब

  1. Pingback: casino online

Comments are closed.

error: Content is protected !!