इक्कीसवीं सदीं का इक्कीसवां साल

Sufi Ki Kalam Se

‘सुबह होती है, शाम होती है
जिंदगी यों ही तमाम होती है।’
अभी कुछ समय पहले ही 2020 का आर्टिकल लिखा था। कुछ समय पहले ही तो कोरोना महामारी ने, हमारा जीवन अस्त व्यस्त किया था।भारत में 2020 का आगमन, शाहीन बाग के प्रदर्शन के साथ शुरू हुआ था, और खत्म, किसान आंदोलन के साथ हुआ है।इस दौरान और भी कई परेशानियों ने हमे अलग अलग तरीके से प्रभावित किया है।
एक साल के बारह महीने ही हमे जिंदगी का कितना गहरा अहसास करा जाते हैं। कहते हैं कि समय का पहिया सबसे तेज होता है, जो इतनी तेजी से गुजर जाता है कि पता ही नहीं चलता। हम सोचते रहते हैं कि फला काम अब करेंगे, अब करेंगे, लेकिन देखते ही देखते अब, कब, तब मे बदल जाता है, पता ही नहीं चलता। दूसरी बात हम समस्याओं का बहाना बनाते रहते हैं लेकिन एक साल के दो बड़े प्रदर्शनों से जाहिर होता है कि समस्याएं भी कभी समाप्त नहीं होती है। विभिन्न देशों की सरकारें ऐसे फैसले लेती रहती है जिससे समस्याओं का पैदा होना स्वाभाविक है और इसी के प्रत्युत्तर में, अनचाहे आंदोलन देश व दुनिया को झेलने पड़ते हैं।
दुनिया भर के आंदोलनों और प्रदर्शनों ने ही नहीं, बल्कि कोरोना जैसी महामारी ने भी अतिरिक्त समस्या बनकर हमारे जीवन को काफी प्रभावित किया है। ऐसा कोई साल नहीं गुजरता, जब समस्याएं या खुशियाँ ना हो। सबका मानना है कि 2020 तो पूरी तरह से कोरोना की भेंट चढ़ चुका है जबकि यह बात पूर्णतया सत्य नहीं है। यह कह सकते हैं कि कोरोना ने साल को प्रभावित तो किया है लेकिन कई नए अनगिनत अवसर भी पैदा किए हैं। कोरोना काल का हमारे जीवन पर अगर नकारात्मक प्रभाव पड़ा है तो सकारात्मक प्रभाव से भी इंकार नहीं किया जा सकता है। इंसान चाहे तो कोरोना का बहाना करके पूरे साल की नाकामी छिपा सकता है लेकिन करने वालों ने तो इसी कोरोना काल में वह सब करके दिखा दिया है जो अब तक नहीं किया था और अपना भविष्य सुरक्षित कर लिया है। इस बात को शिक्षण संस्थानों के एक उदाहरण से समझा जा सकता है। देश भर में जिन शिक्षण संस्थानों ने समय की नब्ज पकड़ कर अवसर को भुनाया है, वो इतना प्रगति कर चुके हैं जितनी पूर्व में कभी नहीं की। उत्कर्ष कोचिंग संस्थान राजस्थान सहित देश व दुनिया के अनेकों प्लेटफॉर्म ऐसे है जो रातों रात समय की मांग के अनुसार परिवर्तन करके अपनी किस्मत के सितारों को बुलंदी तक ले गए, और जो कोरोना के खत्म होने का इंतजार करते रहे, वह पहले से भी ज्यादा पिछड़ गए। ऐसे ही अनेक उदाहरण हर क्षेत्र में देखे जा सकते हैं।
कोरोना तो सिर्फ एक बहाना है, पूरी दुनिया का इतना आधुनिकीकरण तो कुछ सालो पूर्व ही हो जाना चाहिए था, क्योंकि दुनिया इक्कीसवीं सदी के इक्कीसवें साल में प्रवेश कर चुकी है। इस बात में कोई संदेह नहीं है कि इक्कीसवीं सदी विज्ञान और चमत्कार के क्षेत्र में निरन्तर प्रगति पर है। इसलिए देश के नागरिको को भी समस्याओं और चुनौतीयों का सामना करते हुए, दुनिया में भारत का परचम लहराने के लिए प्रयासरत रहना चाहिए।
– नासिर शाह (सूफ़ी)


Sufi Ki Kalam Se

2 thoughts on “इक्कीसवीं सदीं का इक्कीसवां साल

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