फिल्म समीक्षा – दंगल

Sufi Ki Kalam Se

📝 सूफी की कलम से…..
“दंगल” (फिल्म समीक्षा)
आमिर खान एक बार फिर अपनी नई फिल्म ‘दंगल’ को लेकर दर्शको के दरबार मे उपस्थित है। फिल्म मे हरियाणा के पहलवान महावीर सिंह फोगाट की जीवनी बताई गई है।मिस्टर परफेक्शनिस्ट माने जाने वाले आमिर खान ने फिल्म के मुख्य किरदार महावीर फोगाट के रोल के साथ पुरा न्याय किया है।


फिल्म दगंल मे एक भारतीय पहलवान महावीर सिंह मजबूरीयो के चलते देश के लिए गोल्ड मेडल लाने मे सफल नही रहा तो उसने अपना यह सपना अपने होने वाले बेटे के माध्यम से पुरा करने का निश्‍चय लिया।कुछ दिनो बाद उसे बेटे की जगह बेटी पैदा हुई तो वह निराश होकर दुसरी सतांन के रूप मे बेटा होने की उम्मीद करने लगा लेकिन उसे एक के बाद एक चार लडकीया पैदा हुई और वह पुरी तरह से टुट गया और अपना सपना भूलकर उदास रहने लगा। किसी दिन अचानक अपनी दो बडी लडकीयो की बहादुरी देखकर महावीर सिंह अपनी बेटीयो के माध्यम से अपने सपने को पुरा करने के सपने फिर से देखने लगा और लडकियों की इच्छा के विरूद्ध उन्हे पहलवानी का प्रशिक्षण देने लगा। महावीर के इस फैसले से ना तो उसकी लडकियां खुश थी और ना ही उसकी पत्नि, ना ही उसके गॉव वाले खुश थे और ना ही उसके समाज वाले। सबकी इच्छा के विरूद्ध जाकर महावीर सिंह ने कडी मेहनत से दोनो लडकीयो गीता और बबीता को अन्तरराष्ट्रीय स्तर का पहलवान बना दिया। गीता जब अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर खेलने जाती है तो उसमे भी अहंकार और स्वार्थ आ जाता है लेकिन लगातार मिली असफलताओं के कारण वह फिर से अपने पिता से प्रशिक्षण प्राप्‍त करके कामयाबी की और बढती है।


निर्देशक ‘नितेश तिवारी’ ने बडी ही सुन्दरता के साथ देश की नारी शक्ति को दर्शको के सामने प्रस्तुत किया है। देश मे हर तरफ बेटीयो के उत्थान के लिए बडी बडी बाते और वादे किये जाते है लेकिन उन बातो को अमली जामा नही पहनाया जाता।
भारतीय सस्कृंति व संस्कारो के सुन्दर अकंन के साथ ही फिल्म मे वर्तमान भारतीय समाज के नकारात्मक दृष्टिकोण पर करारा प्रहार किया गया है। एक लाचार भारतीय पिता के संघर्ष की कहानी दर्द भरे अदांज मे प्रस्तुत की गई है और साथ ही देश मे महीलाओ की उन्नति व खेलो के लिए कितनी अव्यवस्थाए है, इन्हे भी स्पष्ट रूप से दिखाया गया है। फिल्म मे पहलवानो के भारतीय राष्ट्रीय कोच और एक आम पिता की प्रतिस्पर्धा देश के सिस्टम की पोल खोलती है।
फोगाट बहने गीता और बबीता की प्रसिद्धि जो अब तक सिर्फ खेल दुनिया तक ही सिमित थी, सिनेमा के माध्यम से घर घर पहुँचाने की कोशिश की गई है।
2010 मे भारत(दिल्‍ली) मे आयोजित हुए कॉमनवेल्थ गेम्स को भी फिल्म मे प्रस्तुत किया गया है जिसमे पहली बार किसी भारतीय महीला ने गोल्ड जीतकर देश का नाम रोशन किया है।


फिल्म के दो गीत “बापू तु तो सेहत के लिए हानिकारक है ” और ‘बलमा इडियट है’ दर्शको को खूब हसॉते है तो ‘दगंल’ और ‘धाकड’ गीत दर्शको को उत्साह से भर देते है साथ ही एक भावनात्मक गीत के माध्यम से दर्शको को कहानी से जोडने की कोशिश की गई है। प्रेरणात्मक और भावनात्मक पहलूओ के साथ कहानी मे मनोरंजन का तडका भी लगाया गया है। फिल्म मे सिर्फ प्रेम कहानियॉ तलाशने वाले दर्शक इस फिल्म से दुर रहे। हरियाणवी बोली के प्रयोग से फिल्म की सुदंरता मे वृद्धि हुई है। फिल्म जहॉ एक और रूढीवाद पर हमला करती है तो दुसरी और दर्शको को देशभक्ति की भावना से भर देती है। पहलवान लडकीयो की कमी के चलते गीता को लडको से कुश्ती लडनी पडती है जहॉ उसका उपहास उडाया जाता है और अश्लील टिप्पणियो का सामना करना पडता है। समाज के लोगो की यह हरकत समाज का चरीत्र उजागर करती है लेकीन गीता सबको मुहँ तोड जवाब देकर आगे बढती है।
फोगाट बहनें गीता और बबीता के रोल मे क्रमशः फातिमा शेख और सान्या मल्होत्रा का काम सराहनीय रहा है तो इनकी मॉ के रोल मे साक्षी तँवर की भुमिका गौंण रही है। फिल्म की लम्बाई दर्शको को थोडा सा नीरस कर सकती है। वास्तविक तथ्यो को फिल्म मे थोडा बढा चढाकर प्रस्तुत किया गया है। फिल्म भले ही 500 करोड रूपये कमाने मे कामयाब रहे या ना रहे लेकिन महीलाओ के प्रति नकारात्मक दृष्टिकोण रखने वाले लोगो का ह्रदय परिवर्तन करने मे अवश्य कामयाब होगी. इस बात से भी इन्कार नही किया जा सकता की इस फिल्म मे आमिर की उपस्थिति ने फिल्म को चर्चित और कामयाब बनाया है। फिल्म ने पहले तीन दिन मे 100 करोड कमाकर अपनी काबिलियत सिद्ध कर दी है।


फिल्म के एक डायलॉग ” हमारे देश की बेटीयॉ भी गोल्ड ला सकती है अगर उनको प्रयाप्त सुविधाएँ मिले तो” देश मे महीलीओ के खेल के लिए फैली अव्यवस्थाओ पर व्यग्यं करती है। फिल्म मे कई प्रेरणात्मक पहलूओ पर भी प्रकाश डाला गया है।अगर कोई फिल्म से प्रेरित होकर कुछ प्राप्त करना चाहते है तो “कल सुबह 5 बजे तैयार रहना”।

  • – नासिर शाह (सूफ़ी)

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