एक डॉक्टर की कहानी
अस्पताल की जुबानी

Sufi Ki Kalam Se

एक डॉक्टर की कहानी
अस्पताल की जुबानी

डॉक्टर शकील की कहानी पीएचसी बमोरिकलां, की जुबानी


नमस्कार साथियों!
मैं राजस्थान का एक छोटा सा अस्पताल (पीएचसी) हूँ, जो बारां जिले के एक छोटे से गांव बमोरी में प्रतिस्थापित हूँ। जिस स्थान पर मैं हूँ वो गाँव और जिला दोनों छोटे है लेकिन मेरे असाधारण कामों के कारण मुझे पूरे राजस्थान ही नहीं बल्कि पूरे देश में आदर्श अस्पताल के रूप में पहचान प्राप्त हो चुकी है।
आप सब इस बात से भलीभांति परिचित हैं कि हर कामयाबी के पीछे किसी इंसान का हाथ होता है। मुझे भी एक साधारण अस्पताल से आदर्श अस्पताल में बदलने के पीछे वैसे तो समस्त चिकित्सको एंव ग्रामीणों का योगदान रहा है लेकिन एक शख्स मुझे ऐसा मिला है जिसने मेरी पहचान ही बदल दी है और वह शख्स है डॉक्टर शकील अंसारी।
डॉक्टर शकील के आने से पहले तक मैं भी देश के दूसरे साधारण सरकारी अस्पतालों जैसा ही था, लेकिन जब डॉक्टर शकील नामी एक युवा और नवाचार वाली सोच रखने वाले डॉक्टर ने मुझे जॉइन किया तबसे मुझे एक नयी पहचान मिल गई है।
सरकारी अस्पताल का नाम सुनते ही लोगों के चेहरों पर विभिन्न प्रकार की प्रतिक्रियाएं आती है और आनी भी चाहिए क्योंकि देश के लगभग समस्त सरकारी अस्पतालों से हम अच्छे से परिचित हैं। मेरा हाल भी बाकी अस्पतालों जैसा ही था।
मेरा निर्माण 1970 में हुआ था। निर्माण के बाद देश के बाकी अस्पतालों की तरह ही मैंने भी समस्त प्रकार की पीड़ाएं झेलना शुरू कर दिया था। देखते ही देखते मेरी इमारत जर्जर होने लगी। अस्पताल की समस्त गंदगी और खराब उपकरणों से मेरे समस्त कक्ष भरे जाने लगे। एक एक करके सारे कक्ष मरीज़ों के स्थान पर कबाड़ से भरकर बंद कर दिए गए। अब जो मरीज़ आते हैं उन्हें कमरों के स्थान पर गैलरी या पेड़ के नीचे देखा जाने लगा। मरीजों के लिए ना बैठने की व्यवस्था थी और ना ही पीने के पानी की। उनको दवा लेने के लिए भी पानी, पास की चाय की दुकान से लेना पड़ता था। मेरी ये दयनीय हालत देखकर, मैं ठगा सा अपनी जर्जर हालत पर रोता था, लेकिन कोई मुझ पर तरस खाने वाला नहीं था।

डॉ शकील का आगमन :-
24 नवंबर 2012 का दिन मेरी जिन्दगी का एक यादगार दिन है क्योंकि इसी दिन नजदीकी शहर मागंरोल के रहने वाले डॉक्टर शकील ने यहां कार्यभार ग्रहण किया। नए डॉक्टर साहब ने कार्य भार ग्रहण करते ही मेरी दयनीय हालत को सुधारने का जिम्मा ले लिया। सर्वप्रथम एक नयी पानी की मटकी रखकर मरीज़ों को पानी उपलब्ध कराया जिससे मरीज़ों को होने वाली एक असुविधा तो समाप्त हुई। और इसी प्रशंसनीय काम के साथ ही डॉक्टर शकील ने मेरी समस्त जिम्मेदारियां अपने कंधों पर उठा ली। साफ सफाई से लेकर रंग रोगन तक, बगीचे से लेकर मरीज़ों की समस्त प्रकार की समस्याओं के समाधान का जिम्मा डॉक्टर साहब ने अपने ऊपर ले लिया था। देखते ही देखते मेरी काया पलट गई। जहाँ डॉक्टर शकील साहब के आने से पहले मेरे पास केवल पच्चीस से तीस मरीज़ प्रतिदिन आते थे वही ये संख्या बढ़कर लगभग दो सौ मरीज़ प्रतिदिन हो गई, यानी पूर्व में मेरी वार्षिक ओपीडी नौ हजार हुआ करती थी जो अब सत्तर हजार हो गई। डॉक्टर शकील के साथ ही अन्य स्टाफ कर्मियों एंव ग्रामवासियों ने भी मुझे स्वच्छ और सुन्दर बनाने में काफी योगदान दिया है। यही कारण है कि राजस्थान सरकार की कायाकल्प योजना में मुझे अट्ठासी अंकों के साथ प्रथम पुरूस्कार प्राप्त हुआ है। मेरी साफ सफाई और उचित व्यवस्था देखकर लोग अपने जुते चप्पल बिना कहे ही बाहर उतार देते और मेरी खूबसूरती को बरकरार रखने मे मदद करते। प्रशासन और मीडिया बंधु जब मेरी विजिट को आए तो मुझे निजी चिकित्सालय की संज्ञा दिए बिना नहीं रह सके।

@साभार दैनिक भास्कर


तो साथियो, ये थी मेरी कहानी। उम्मीद है आपको पसंद आई होगी। अगर आप इस तरह के नवाचार के कामों में रुचि रखते हैं तो फिर आइये कभी, पीएचसी बमोरी। आपका स्वागत और इंतजार है।

डॉ शकील जीवन परिचय एंव संघर्ष की कहानी :-
डॉ शकील का जन्म बारां जिले के मांगरोल कस्बे में 25 फरवरी 1982 को हुआ। इनके पिता का नाम डॉ अब्दुल हमीद ,और माता का नूरजहां बेगम है । इनकी जीवनसंगिनी अर्शी जैब है।


चूंकि डॉ शकील के पिताजी भी डॉक्टर थे और वो अपने बेटे को भी डॉक्टर ही बनना चाहते थे इसलिये उन्होंने बचपन से ही उन्हें डॉक्टर बनने को प्रेरित किया। डॉक्टर शकील की प्रारम्भिक शिक्षा मागंरोल के ही स्थानीय मदरसे अंजुमन इस्लामिया मे हुई। जंहा इन्होंने अरबी और दीनी तालीमात के साथ साथ हिंदी की भी पढ़ाई की। उसके बाद कक्षा छः से सरकारी स्कूल में पढ़ाई की और पहली बार अंग्रेजी की वर्णमाला सीखी। उनके सरकारी स्कूल के नजदीक ही मांगरोल का सरकारी अस्पताल था,जहां पर वह अक्सर डॉक्टरों को देखते और खुद भी डॉ बनने की कल्पना करते। बारहवीं तक मांगरोल के ही हिंदी मीडियम सरकारी विद्यालय में पढ़ाई की उसके बाद पीएमटी पास करके 2003 में एमबीबीएस में प्रवेश ले लिया। डॉक्टर शकील मागंरोल शहर के और अंजुमन मदरसे के पहले हिन्दी मीडियम विद्यार्थी थे, जिन्होंने ये मुकाम हासिल किया।

डॉक्टर के रूप में सफर :-


एमबीबीएस पास करने के बाद प्रथम पोस्टिंग दिल्ली के सरकारी अस्पताल में जूनियर रेजिडेंट के रूप में हुई। तीन साल दिल्ली के सरकारी अस्पतालों में काम करने के बाद दिसंबर 2011 में RUHS की परीक्षा पास करके चिकित्सा अधिकारी के रूप में प्रतिनियुक्ति पर मांगरोल सीएचसी में जॉइन किया । लगभग एक साल सीएचसी मांगरोल में कार्य किया।
उसके बाद प्रतिनियुक्ति कैंसिल होने पर अपने मूल पदस्थापन पीएचसी बमोरिकलां में दिनांक 24 नवम्बर 2012 में जॉइन किया।
नवंबर 2012 से लेकर सितंबर 2020 तक पीएचसी बमोरी में सेवा देने के बाद डॉक्टर शकील वर्तमान में अपने होमटाउन मागंरोल मे अपनी सेवाएं दे रहे हैं।

  • – नासिर शाह (सूफ़ी)

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158 thoughts on “एक डॉक्टर की कहानी
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