गहलोत सरकार को अफराजुल, पहलू खां, रकबर आदि के परिजनों की भी मदद करनी चाहिए

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गहलोत सरकार को अफराजुल, पहलू खां, रकबर आदि के परिजनों की भी मदद करनी चाहिए


जयपुर (थार न्यूज़-इक़रा पत्रिका)। 28 जून को राजस्थान के उदयपुर में टेलर का काम करने वाले कन्हैयालाल नामक व्यक्ति की रियाज व गौस नामक दो आतंकियों ने दुकान में कपड़े सिलवाने के बहाने आकर सरेआम गला रेत कर हत्या कर दी तथा हत्या से पहले और हत्या के दौरान बनाए गए वीडियो को उन्होंने सोशल मीडिया पर वायरल भी कर दिया। मानवता को शर्मसार करने वाले इस घिनौने अपराध के कुछ घण्टों बाद ही दोनों कातिलों को पुलिस ने दबोच लिया। इस घिनौने अपराध की जितनी निन्दा की जाए उतनी कम है। मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने आर्थिक मदद के तौर पर मृतक के परिजनों को 50 लाख रूपए का चैक दिया और दोनों बच्चों को सरकारी नौकरी देने की घोषणा की। गहलोत सरकार का यह फैसला बहुत ही सराहनीय है, क्योंकि यह सरकार की जिम्मेदारी बनती है कि वो ऐसे घिनौने अपराध से पीड़ित परिजनों के पक्ष में खुलकर खड़ी हो और उनके जीवनयापन के लिए हर तरह की मदद करे।

लेकिन जब सरकार ऐसे मदद के कार्य करते समय भेदभाव बरते तो उसकी आलोचना भी होनी चाहिए। राजस्थान के राजसमन्द में 06 दिसम्बर 2017 को ऐसा ही घिनौना अपराध हुआ था, जहाँ अफराजुल नामक मजदूर की शम्भुलाल नामक आतंकी ने गैंती से हत्या कर लाश को जला दिया था, उसने भी इस हत्याकाण्ड का वीडियो बनाकर वायरल किया था। इसी तरह राजस्थान के बहरोड़ में कुछ बरसों पहले पहलू खां नामक गौपालक की सरेआम आतंकियों ने पीट पीट कर हत्या कर दी थी। ऐसा ही वाकिया अलवर जिले में रकबर के साथ भी हुआ, जिसे पीट पीट कर मार दिया गया। ऐसे कुछ और घिनौने अपराध भी राजस्थान में हुए हैं, जिनमें बेकसूर लोगों की हत्या की गई है। लेकिन इन मृतकों में किसके परिजनों को 50 लाख रूपए सरकार ने दिए और किसको सरकारी नौकरी दी ? शायद किसी को नहीं। मदद की भी है तो दो पांच लाख रूपए। ऐसा क्यों ? क्या यह भेदभाव नहीं है ?

सरकार को हर हत्यारे को कड़ी सजा दिलवानी चाहिए और हर मृतक के परिजनों को उचित आर्थिक सहायता देनी चाहिए। माॅब लींचिग या आतंकी घटना में मरे लोगों के परिजनों को एक जैसी आर्थिक मदद और सरकारी नौकरी देनी चाहिए। इसमें जाति धर्म देखकर भेदभाव नहीं करना चाहिए। बेहतर होता मुख्यमंत्री गहलोत अफराजुल, पहलू खां, रकबर आदि के परिजनों को भी 50 लाख रूपए और सरकारी नौकरी देते। यह इसलिए भी जरूरी है कि गहलोत अपने आपको गांधी का अनुयायी कहते हैं। क्या गांधी ऐसा भेदभाव बरदाश्त करते थे ? हरगिज़ नहीं। अगर आज गांधी होते तो इस भेदभाव को लेकर गहलोत सरकार के खिलाफ़ सत्याग्रह करते। इस मुद्दे पर राजस्थान के कांग्रेसी नेताओं व जन संगठनों को भी अपना मुंह खोलना चाहिए, ताकि उक्त पीड़ितों के परिजनों का भी भला हो सके।

(09-07-2022)

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-@-एम फारूक़ ख़ान सम्पादक इकरा पत्रिका


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