सफेद स्मैक का काला सच, गेस्ट रिपोर्टर मे पढ़िए जयपुर के मशहूर पत्रकार फरहान इसराईली की विशेष रिपोर्ट

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सफेद स्मैक का काला सच

@जयपुर न्यूज : धीमे जहर स्मैक का नशा राजधानी के कोने कोने में फैल चुका है।
सैंकड़ों युवकों को इसकी लत लग चुकी है। स्मैक की सप्लाई भी क्षेत्र के ही लोग कर रहे हैं, जो हर रोज 200 से अधिक पुडिय़ा बेच कर युवा पीढ़ी की सांसोंं में नशीली धुंआ घोल रहे हैं। जयपुर के हर कोने में कई ठिकानों पर स्मैक का धंधा चोरी छिपे व अब तो खुलेआम पनप रहा है। जहां 200 से 300 रुपए में सफेद धुंए की पुडिया सहज ही मिल जाती है। ऐसा नहीं है कि पुलिस को इसकी जानकारी न हो, लेकिन आरोप है कि पुलिस व प्रशासन की गंभीरता ना होने से ही यह कारोबार पैर पसार चुका है।



सूत्र बतातें है कि स्मैक की 1 ग्राम की पुडिया 700 रुपए में आती है, इसकी यहां 20-20 प्वांइट की 5 पुडिया बनती है, जो 250 से 300 रुपए में बिकती हैं। यानि 1 ग्राम के 1000 से 12 सौ रुपए तक वसूले जाते हैं। जिस तरह से शराब पीने वाले बार में जाकर शराब पीते हैं स्मैक पीने वालों के लिए ऐसी कोई जगह नहीं है तो वह कब्रस्तान, सुनसान जगह, गंदे नाले, झाड़ियां व जंगल इस तरह की जगह पर बैठ कर नशा करते हैं।
सूत्र बताते हैं कि शहर के चार दरवाज़ा, बांस बदनपुरा, ईदगाह, आमागढ़, नाहरी का नाका, शास्त्री नगर सहित ज्यादातर मुस्लिम इलाकों के थाने के बीट कांस्टेबल से लेकर दारोगा तक नशे के इस काले धंधे से वाकिफ हैं। हालांकि पुलिस व पुलिस के आला अधिकारियों द्वारा समय-समय पर अभियान चलाए जाते हैं ।उनमें धरपकड़ भी की जाती है। लेकिन नशा तस्करों का इतना गहरा जाल बन चुका है की पुलिस की पकड़ में हमेशा छोटे-मोटे तस्कर ही आते हैं बड़ी मछलियां अभी भी पुलिस की पकड़ से दूर हैं।



नशे के आदी छोड़ना चाहते हैं नशा
नशे की जद में आए कई युवाओं का उनके परिजनों ने नशा मुक्ति केंद्र पर ले जाकर इलाज भी करवाया, मगर घर वापस लौटने पर वे फिर वे इस धीमे जहर का शिकार बन रहे हैं।हालांकि इससे पीड़ित जो लोग हैं वो कोई अपराधी नहीं है ना ही हमें उनसे अपराधियों जैसा सलूक करना चाहिए ।अधिकतर नशाखोरों से बात करने पर पता लगा कि वह बीमार हैं और इसे छोड़ना भी चाहते हैं ।लेकिन वह इतने आदी हो चुके हैं कि वह इसे इस्तेमाल नहीं करें तो उनके शरीर में तरह-तरह के दर्द व तकलीफ जैसी परेशानी का सामना करना पड़ता है। और अब उन्हें मजबूरन नशा लेना पड़ रहा है।

शहर में बढ़ी चोरी की वारदातों में भी अधिकतर ऐसे ही नशाखोर युवा शामिल हैं।
पुलिस चोरी व झपटमारी की वारदातों में कई बार ऐसे अपराधियों को गिरफ्तार कर चुकी है, जिनकी तलाशी में नशीले पदार्थ बरामद होते हैं।पूर्व में किसी अपराध में शामिल न होने और परिवार की साफ सुथरी छवि होने के कारण पुलिस उनसे गहन पूछताछ करती है।पुलिस यह पता लगाने का प्रयास करती है कि उन्हें चोरी या अन्य अपराध करने की क्या आवश्यकता पड़ी थी। पूछताछ में बस यही सामने आता है कि वह नशा करने लगे हैं और नशे की पूर्ति के लिए उन्होंने यह अपराध किया है।




इन जगहों पर आसानी से उपलब्ध हो जाते हैं स्मैक व अन्य नशे 250-300 रुपये कीमत में बेचे जाने वाले स्मैक (सफेद पाउडर) व चरस का सबसे ज्यादा व्यापार शहर के चार दरवाजा, बास बदनपुरा, ईदगाह कॉलोनी, रामगंज, आमागढ़, जवाहर नगर, खो नागोरियान, नाहरी का नाका, भट्टा बस्ती और शास्त्री नगर सहित अधिकतर मुस्लिम इलाकों में बड़े पैमाने पर किया जा रहा है। इसकी जानकारी न सिर्फ आमजन को है बल्कि, प्रशासन और पुलिस महकमे के अधिकारियों को भी है।

ये हैं इलाज के तरीके
एडिक्शन छुड़वाना बहुत मुश्किल भी नहीं है। अगर कोई एडिक्ट हो गया है तो उसे विशेष डॉक्टर से मिलने में हिचकिचाना नहीं चाहिए। ऐसा कोई शख्स फैमिली, फ्रेंड्स या सर्किल में हो तो उसे साइकायट्रिस्ट के पास ले जा सकते हैं। फैमिली को समझना पड़ेगा कि यह एक बीमारी है, न कि उसकी गलती। कोई जानबूझकर नशा कर रहा है और छोड़ना नहीं चाहता, जैसी बात नहीं सोचनी चाहिए। बीमारी है तो इसका इलाज भी है। मरीज को इलाज तक पहुंचने में और इलाज में मदद करें। मरीज को फिर से सुधरने के लिए कुछ मौका दें, थोड़ा वक्त दें। आजकल तो होम्योपैथी, यूनानी, एलोपैथी व तीनों ही पेथियों में इसका इलाज संभव है ।इन दिनों तो कई संस्थानों व अस्पतालों द्वारा तो यह निशुल्क भी दी जा रही है।

फरहान इसराइली
पत्रकार व लेखक
(रॉयल पत्रिका)


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