रोंगटे खड़े कर देने वाली है आईशा, आत्महत्या की दास्तान

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रोंगटे खड़े कर देने वाली है आईशा, आत्महत्या की दास्तान


वीडियो रिकॉर्डिंग : – हैलो अस्सलामुअलैककुम। मेरा नाम है आयशा.. आरिफ खान ।और मैं जो कुछ करने जा रही हूँ, अपनी मर्जी से करने जा रही हूँ। इसमे किसी का जोर या दबाव नहीं है। क्या कहें? ये समझ लीजिए, खुदा की जिंदगी इतनी ही होती है, और मुझे इतनी ही जिंदगी बहुत सुकून वाली मिली।
और डियर डैड! कब तक लड़ोगे अपनों से? केस विड्रॉल कर दो,… नहीं करना? आईशा लड़ाई के लिए नहीं बनी है।
प्यार करते हैं आरिफ से, उसे परेशान थोड़े करेंगे। अगर उसे आजादी चाहिए तो ठीक है। अपनी जिंदगी तो यही तक है। मैं खुश हूँ, की अल्लाह से मिलूंगी, और उन्हें कहूँगी की मेरे से ग़लती कहा रह गई? मां बाप अच्छे मिले, दोस्त भी बहुत अच्छे मिले, पर शायद कहीं कमी रह गई मुझमे या शायद तकदीर में। मैं खुश हू, सुकून से जाना चाहती हूं। अल्लाह से दुआ करती हू की अब दुबारा इंसानो की शकल ना दिखाए। एक चीज़ जरूर सीख रही हूं, मोहब्बत करनी है तो दोतरफ़ा करो, एकतरफ़ा मे कुछ हाशिल नहीं होगा। चलो, कुछ मोहब्बतें तो निकाह के बाद भी अधूरी रहती है।
यह प्यारी सी नदी है (नदी की तरफ़ देखते हुए) प्रे करते हैं कि यह मुझे अपने आप में समा ले। और मेरे पीठ पीछे जो भी हो, प्लीज, ज्यादा बखैड़ा मत करना।मैं हवाओ की तरह हूं, बस बहना चाहती हूँ और बहते रहना चाहती हूँ। किसी के लिए नहीं रुकना। मैं खुश हूँ आज के दिन, की मुझे जो सवालों के जवाब चाहिए थे वो मिल गए, और मुझे जिसको जो बताना था सच्चाई वो बता चुकी हूँ, बस काफी है। थैंक यूउउउ। और मुझे दुआओं में याद करना, क्या पता मुझे जन्नत मिले या ना मिले। चलो…
अलविदा। “


यह चंद पंक्तियाँ कहकर हिन्दुस्तान की एक बेटी आईशा, हंसते हुए गुजरात की साबरमती नदी में हमेशा हमेशा के लिए समा गई, मगर साथ ही कई सवाल भी छोड़ गई। अगर इस आवाज और दर्द को सिर्फ आईशा का दर्द समझा जाए तो शेष पीड़ित महिलाओ के साथ नाइंसाफी होगी। इस मामले को सिर्फ राजस्थान या गुजरात का कहना भी बेईमानी होगी। इसे केवल एक पत्नी का दुख बताना भी पूर्ण सच्चाई नहीं है क्योंकि ये एक पत्नी ही नहीं बल्कि एक बहिन, एक मां, एक बेटी का दर्द है जिसे जिस तरह चाहे महसूस किया जा सकता है। मरहूम आईशा की ये आवाज, ना सिर्फ उसके शौहर के लिए है और ना ही सिर्फ उसके घरवालों के लिए। बल्कि ये आवाज निसंदेह तमाम देशवासियों के लिए है ।
हम कौनसे समाज में जी रहे हैं? कैसे जी रहे हैं? आखिर ये सब क्यों हो रहा है? कब तक हमारा समाज हमारी ही बहिन बेटियों के लिए नर्क बना रहेगा? कब तक इस समाज के मर्द, औरतों पर तानाशाही करके अपनी झूठी मर्दानगी का दम भरते रहेंगे?


बड़े अफ़सोस का मकाम है। आए दिन देश में कहीं बहन बेटियों की इज्ज़त से खिलवाड़ हो रहा है तो कहीं उनको जिंदा जलाया जा रहा है। कहीं उनको खुदखुशी करने को मजबूर किया जा रहा है तो कहीं उन्हें जिंदा लाश बनाकर घर की चारदीवारी में कैद किया जा रहा है। मामले इतने है और इतनी संख्या में है कि गिनती सुनते ही होश उड़ जाते हैं। और जिस तरह के मामले है उनके बारे में सुनकर तो रूह ही काँप जाती है।
आईशा का ये कहना की पापा मेरे जाने के बाद भी आरिफ को परेशान मत करना। प्यार करते हैं हम आरिफ से।’ यह वाक्य एक महिला की कितनी गहरी महानता प्रदर्शित करता है। एक पुरुष को एक स्त्री की वफादारी और मोहब्बत का इससे बढ़कर क्या सबूत चाहिए? एक महिला मरने जाती है और एक इंसान रूपी वहशी जो बदनसीबी से उसका पति है, उससे उसकी मौत का सबूत मांगता है। इंसानियत को शर्मशार करने वाली इससे बुरी और क्या घटना हो सकती है?
सोशल मीडिया पर आईशा का आत्महत्या से पहले का वीडियों और घरवालों से बातचीत का ऑडियो दोनों वाईरल है। ऑडियो में एक बाप अपनी बेटी को उसके नाम का मतलब याद कराते हुए कहता है कि बेटी तेरा नाम तमाम उम्मत की मां हज़रत आईशा (र.अ.) के नाम पर रखा है इसलिए ऐसा काम मत कर। इतना ही नहीं वो बदनसीब बाप अपनी बेटी को कुरआन की कसम भी दिलाता है। मां का रो रोकर बुरा हाल है लेकिन बेटी है कि पति और ससुराल की तरफ से इतनी मजबूर है कि वो ना चाहते हुए भी मौत को गले लगा ही लेती है और अपने साथ साथ अपने मां बाप और भाई बहिनों की जिंदगी भी विरान है कर जाती है। आईशा का ये हृदय विध्वंसक आडियो और वीडियों रोगंटे खड़े कर देना वाला है मगर रोंगटे खड़े कर देने भर से समाज में दूर दूर तक कुछ बदलाव की संभावना नजर नहीं आती है।
महज काग़ज़ के चंद रुपयों या उनसे आई हुई भोग-विलास की कुछ वस्तुओं के खातिर, कैसे एक इंसान फूल जैसी कोमल और समंदर की गहराई से ज्यादा प्रेम करने वाली औरत को ख़ुदकुशी करने पर मजबूर कर देता है? क्यों एक छोटा सा शक, बगीचों के खूबसूरत फूलों को उजाड़ देता है।
आईशा जैसी ही अनगिनत पीड़ित महिलाये अल्लाह /इश्वर के दरबार में कितनी शिकायतें कर चुकी होगी? फिर उसी अल्लाह/ईश्वर की इबादत करने वाले पुरुष उनके साथ इस तरह का अन्याय क्यों करते हैं, जिसे देखकर पूरी कायनात शर्मिंदा हो जाती है। आईशा यह सवाल खुदा से पूछेगी की उससे क्या गलती हुई? मतलब इंसान की कारस्तानीयों का सवाल खुदा से पूछा जाएगा, सोचो, खुदा इंसानो की इन हरकतों का क्या ज़वाब देगा और जो जवाब देगा उसकी इंसानो को कितनी फिक्र है? हमारे देश में सबसे ज्यादा आस्तिक लोग रहते हैं बावजूद इसके भी सब अपने अपने धार्मिक नियमो की खुले आम धज्जियाँ उड़ाते है।
पता नहीं इंसान ये क्यों भूल रहा है कि वो इस दुनिया में आया भी खाली हाथ है और जाएगा भी खाली हाथ ही, फिर क्यों कुछ लालच के खातिर पूरी इंसानियत को शर्मशार करने वाला काम करता है? कभी निर्भया तो कभी आईशा, कभी आसिफा तो कभी मनीषा! पता नहीं अगला किसका नंबर है?
नासिर शाह (सूफ़ी)


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