“भाग- 22 “ क्या आपकी चाय में कैंसर है” (आओ चले..उल्टे क़दम) कुछ क़दम बीसवीं सदी की ओर “  

Sufi Ki Kalam Se

सूफ़ी की क़लम से…✍🏻

“आओ चले..उल्टे क़दम, कुछ क़दम बीसवीं सदी की ओर “  

भाग- 22 “ क्या आपकी चाय में कैंसर है”

साहित्य की दुनिया में “चाय” का महत्व हमेशा से रहा है चाहे उसके लिए लोगों और चिकित्सकों के कितने ही अलग अलग ख़यालात क्यों ना हों लेकिन ओवरऑल, चाय हमेशा से लोगों की पसंदीदा रही है और आज भी है और शायद हमेशा रहेगी भी । चाय के कई प्रकार होते हैं लेकिन यहाँ हम चाय के विभिन्न प्रकार के बारे में बात ना करके केवल उसके परोसने के तरीक़े पर बात करेंगे जो आज के दौर में सर्वाधिक चलन में हैं ।

घर हो या ऑफिस, बाज़ार हो या स्कूल,अस्पताल या खेत खलिहान ही क्यों न हो, सब जगह चाय पहुँच ही जाती है लेकिन अपने परंपरागत कप- प्लेट में नहीं बल्कि प्लास्टिक कोटेड पेपर डिस्पोजल में, जो हमारे स्वास्थ्य के लिए काफ़ी घातक हो सकता है । नए दौर में शॉर्टकट अपनाने और धोने की झंझट से बचने के लिए लोगों ने डिस्पोजल का इस्तेमाल शुरू कर दिया जो आज व्यापक स्तर पर पहुँच चुका है । ये डिस्पोजल वैसे तो पेपर के बने होते है लेकिन ज्यादातर डिस्पोजल के अंदर रसायनिक कोटिंग की जाती है जिससे गर्म चीज डालने पर वह आसानी से ख़राब नहीं होते लेकिन वो रसायन गर्म चाय के साथ उसमें घुल जाती हैं और हमारे शरीर के अंदर जाकर हमें स्लो कैंसर का निःशुल्क तोहफ़ा दे सकती है । इसलिए सबसे पहले हमें यह सुनिश्चित करना चाहिए कि कहीं हम भी रसायन कोटेड वाली चाय पीकर कैंसर को दावत तो नहीं दे रहे हैं ना?

 पहले बाजारों में चाय पीने का अलग ही आनंद होता था । गर्मागर्म चाय के भगोने में अदरक या इलायची का छौंक इंसान के नथुनों में ख़ुशबू बिखेर कर,  उसे चाय पीने के लिए मजबूर कर देते थे और फिर वो चाय छनकर, जब काँच के कप में गिरती थी तो चाय की सुंदरता दुगनी हो जाती थी । जब चायवाला,  काँच के ग्लासों को आपस में टकराकर लोगों को देता था तो अपने आप चीयर हो जाता था और लोग मजें से चाय का आनंद लेते थे । फिर जमाना बदला और डिस्पोजल आया । अगर आपने इक्कीसवीं सदी के शुरुआती दौर को देखा हो तो आपको याद होगा कि जब नए नए डिस्पोजल बाजार में आए तो चाय के दाम,  काँच के ग्लास में कम और डिस्पोजल में अधिक होते थे क्योंकि वो एक नया फैशन था। डिस्पोजल का ये फैशन ऐसा चला कि सब चाय वालों ने काँच और चीनी के  कप और ग्लास ग़ायब कर दिए और सब जगह सिर्फ़ डिस्पोजल का चलन हो गया।

वक्त ने फिर करवट बदली और लोगों को अहसास हुआ कि डिस्पोजल कप हमारे स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है तो फिर से कप और ग्लास की तरफ़ लौटने लगे और अब वो दिन आ गया जब डिस्पोजल चाय सबसे सस्ती और काँच, चीनी या मिट्टी के बर्तन वाली चाय महंगी मिलने लगी । अगर हम, चाय पीने के हमारे पुराने तरीक़ों को नहीं बदलते तो शायद आज कई तरह की गैस/एसिडिटी और स्लो कैंसर वाली समस्याओं से बचे रह सकते थे। लेकिन अब भी ज़्यादा देर नहीं हुई है, हमें वक्त रहते रसायन वाली डिस्पोजल चाय को अलविदा कह देना चाहिए ताकि स्वास्थ्य के मामले में थोड़ा सचेत रह सकें । हालांकि ये काम आसान नहीं है क्योंकि मौजूदा समय में हर जगह सिर्फ डिस्पोजल का ही बोलबाला है , ऐसे में हमें जितना हो सके इन्हें अवॉयड करना चाहिए। इसके अलावा अपने आसपास की चाय की दुकानों पर, जहां हमारा उठना बैठना ज़्यादा होता है, उन चाय वालों से,पुराने समय की तरह काँच,चीनी या मिट्टी के कप लाने का आग्रह करना चाहिए । थोड़ा वक्त लगेगा लेकिन फिर से वो समय आ जाएगा जिसमें चाय का पुराना स्वाद और अंदाज़ लौट आएगा वो भी बिना रासायनिक कोटेड डिस्पोजल कप के, इसलिए थोड़े पैसे अतिरिक्त खर्च करें और चाय को पुराने तरीके से एंजॉय करें । 

चाय के पुराने दौर की अपनी यादें हमारे साथ ज़रूर शेयर करें (9636652786)

मिलते है अगले भाग में 

आपका सूफी 


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One thought on ““भाग- 22 “ क्या आपकी चाय में कैंसर है” (आओ चले..उल्टे क़दम) कुछ क़दम बीसवीं सदी की ओर “  

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