शिमला और निर्मल वर्मा (यात्रा वृतांत- ज्योति )

Sufi Ki Kalam Se

जब भी पहाड़ों पर आती हूँ मुझे निर्मल वर्मा का लिखा नजर आने लगता है, जब बादलों को देखती हूँ तो उनकी ‘धुंध से उठती हुई धुन’ याद आने लगती है, यात्रा की समाप्ति के बाद वे ‘दिन याद’ आने लगते हैं।
एक बार अल्मोडा मुक्तेश्वर की यात्रा के दौरान मैंने परिंदे कहानी पढ़ी थी। उस कहानी का मुझ पर इतना गहरा असर हुआ कि राजस्थान की तपती जून की गर्मी में भी मुझे शिमला की सर्दी महसूस होती। कभी अकेलेपन में लतिका के दुख को व्यक्तिगत दर्द मान बैठती। उनको पढ़ते हुए मुझे अहसास होता कि मुझे कितनी भूख है पढ़ने की लिखने की इन पहाड़ों पर भटकने की। लाल टीन की छत पढी तो उनके घर जाने की लालसा हो उठी थी, परंतु पिछली बार शिमला में आने के बाद भी उनके घर जाना स्थगित ही रहा क्योंकि कोई उनके घर का पता जानता ही न था। लेकिन इस बार की यात्रा इसी मानस के साथ की थी।
कि अगर नहीं जा पायी तो ये यात्रा अधूरी मानी जाएगी। शायद मुझे फिर से जाना पड़े। किसी छोटे हुए सामान को लेने जैसे। शाम को शिमला पहुँचते ही मैंने लोकल लोगों से उनके घर का पता पूछना शुरू कर दिया मगर अफसोस कोई भी न जानता था इंटरनेट गूगल सब टटोल लिया मगर सब व्यर्थ।हमारे देश में लेखकों और कलाकारों को भुला दिया जाना बहुत आम बात है किसी भटक चुके यात्री की तरह मैं शिमला की गलियों में भटक रही थी अचानक मुझे एक नक्शा दिखा जिसमें यहां जन्मे महान हस्तियों का विवरण था अधूरी जानकारी ली हुए। खैर अब रात हो चुकी थी, कोई रास्ता न पाकर मैं अपने कमरे में चली आई। सुबह होते ही मै यहाँ के ओल्डेस्ट कॉफी हाउस गयी। कॉफी खत्म करने के बाद मैंने झेंपते हुए उनके घर का पता पूछा। exact किसी को नहीं पता था मुझे कुछ लैंडमार्क पता चले, अब इतने बड़े लोअर शिमला या ओल्ड शिमला में कैसे ढूँढ़े? परंतु मेरे पैर एक अजीब सी खुशी और उत्सुकता से उस तरफ बढ़ने लगे। मुझे ठीक पता नहीं था कि उनका घर कहां है किन्तु मैं यह जानती थी कि मैं उसकी ओर जा रही हूँ क्योंकि इस इस रास्ते पर चलते हुए वही सुकुन मिल रहा था जो निर्मल को पढ़ते समय मिलता है, मुझे लगा मैं ये रास्ता जानती हूँ। शायद मैंने उनकी किताबों में पढ़ा है, करीब दो किमी चलने के बाद अपनी अन्तिम कोशिश मानते हुए मैंने एक व्यक्ति से उनको के घर का पता पूछा, जब उन्होंने कहा कि नीचे जाते जाइये, कॉन्वेंट स्कूल पार करके और नीचे जाइये अन्त मे,दायीं मुड़ जाइएगा मैंने उन सज्जन को बहुत सारा धन्यवाद दिया। इस पूरी यात्रा में मुझे पहला ऐसा व्यक्ति मिला था जिनको निर्मल के बारे में पूरा पता था। सरपट उस तरफ दौड़ने लगी। सहसा एक बोर्ड पर नजर पड़ी मैं ठीक उनके घर के सामने खड़ी थी, मेरी ख़ुशी का कोई ठिकाना न था, भाग कर गेट के अन्दर चली गई वहीं सीढ़ियां वहीं गलियारे। इस घर को देखते ही मुझे ‘लाल टीन की छत’ याद आ गई थी, मैं उन्हीं सीढ़ियों पर जाकर बैठ गई जहाँ काया बैठा करती थी। यहां एक अजीब सी सुकून और शांति थी। बाहर आने पर पास में बने ढाबे पर चाय पीते पीते उस लाल टीन की छत वाले घर को देख रही थी दुकानदार ने बताया। की इस घर की छत पहले लाल टीन की ही थी जिसे कई साल पहले हरे रंग से रंग दिया गया था और अब इसमें सरकारी मुलाजिम रहते हैं, होना तो चाहिए कि इसे निर्मल संग्रहालय के रूप में तब्दील कर दें। यह इस रास्ते को निर्मल पंथ के नाम से नामकरण कर दिया जाए। खैर मैं इसे निजी दुख मानकर आगे बढ़ गई। मुझे लगा मेरी यात्रा पूर्ण हो गई।


Sufi Ki Kalam Se

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

error: Content is protected !!