कोरोना से गुफ़्तगू ( उर्दू इंशाइया का हिन्दी अनुवाद )

Sufi Ki Kalam Se

क्या हुआ जनाब ए आली?? कैसे घर में दुबक गए? कहाँ गई तुम्हारी अकड़? बड़े अशर्फूल मखलूक (सर्वश्रेष्ठ) बने फिरते थे। अब क्यों मुझ छोटे से वबा (वाइरस) से इतना घबरा गए?”

‘खामोश बुजदिल!
छुपकर हमला करके बहादुर बनता है? तमाम मुल्क में आतंक मचा कर माशरे (समाज) को खस्ता हाल बना रखा है। अदना - आला (निम्न - उच्च) सबको हिला कर रख दिया है। हिम्मत है तो सामने आकर मुकाबला कर।”

‘ ओहो बरखुरदार! कैसी जाहिलो वाली बाते कहते हो? मैं कब छिपकर वार कर रहा हूं? मैं तो खुल्लमखुल्ला ललकार कर तुम्हें नुकसान पहुंचा रहा हूं, और ये इल्ज़ाम भी गलत है। ना मैं कोई मजहबी इम्तेयाज (धार्मिक भेदभाव) कर रहा हूँ, और ना ही मुल्की (देश आधारित भेदभाव)। ऐसे इम्तेयाज(भेदभाव) तो तुम जैसे इंसान करते हो। मैं तो पूरी दुनिया को एक साथ ललकार कर, बिना उनका मजहब, और मुल्क जाने हमला कर रहा हूँ। तुम इंसानो से ही मुझसे बचने का कोई रास्ता नहीं ढूँढ़ा जा रहा है।”

‘मगर तुम ऐसा कर क्यों रहे हो? क्या तुम्हारे अंदर इंसानियत नहीं है? क्या तुम्हें नहीं पता कि बेगुनाह लोगों को मारना गुनाह ए अजीम (पाप) है?”

‘ ओ! इंसानियत के मुनाफिको (पाखंडियो)! इंसानियत की बातें तुम्हारे मुँह से अच्छी नहीं लगती है। तुम इंसान होकर इंसान के सगे नहीं हो। एक दूसरे से बदतर सलूक (बुरा एंव भेदभावपूर्ण व्यवहार) करते हो, और आए बड़े हमे ही इंसानियत का सबक पढ़ाने। जरा अपने गिरेबां में झाँक कर देखो, फिर पता चलेगा इस सरजमीं पर इंसानियत का सरे आम कत्ल किसने किया है। और गुनाहों की फिक्र भी तुम्हें ही करना चाहिए। दुनिया का ऐसा कौनसा गुनाह बचा है जो तुम इंसान नहीं कर रहे हों? तुम्हारे गुनाहों के सामने तो अब खुद गुनाह भी शर्मिंदा है।”

देखो भाई, सुनो! इंसान तो दुनिया की रंगीनी में खोकर गुनाह कर ही बैठता है, लेकिन तुम्हें ये हक़ किसने दिया कि तुम हमें इस तरह परेशान करो?”

आप फिर इल्ज़ाम लगा रहे हैं हजरत, जो कि आपकी फितरत (स्वभाव) मे शामिल हो चुका है। तुम्हारा काम दुनिया की रंगीनी में खोकर गुनाह करना नहीं है, बल्कि दुनिया में आकर फलाह (भलाई) का काम करने का है, जो तुम भूल चुके हों और दुनिया भर के गुनाहों से अपना दामन तर कर चुके हों। रही बात हमारे हक़ की तो, ये हमें, खुदा( इश्वर) ने दिया है। जब जब इंसानों के गुनाह बढ़ते जाएंगे, तब तब खुदा हम जैसी बलाओं के जरिए तुम्हें सबक सिखाता रहेगा। ”

यह कैसा सबक है? इंसान को इंसान से जुदा किया जा रहा है? दो चार इंसानो से ज्यादा, आपस में बैठ कर अपने हालातों का तजकिरा नहीं कर सकते। अपने घरों में कैद होकर रह गए हैं…”

ओ आदम के पुतले! सुनो ज़रा! बंद करो अपनी मोहब्बत का ढोंग।
तुम इतने संगीन झूठ, इतनी सफाई से कैसे बोल लेते हो ? क्या मुझे नहीं पता की तुम इंसानो के बीच कितनी मोहब्बतें है? आम इंसानो के बीच उठना बैठना तो छोड़ो, तुम आजकल अपने ख़ास कराबत (सगे रिश्तेदारों) के भी सगे नहीं रहे हो। वो तो शुक्र मनाओ मेरा, जो मेरी वज़ह से तुम्हें घरों में कैद होना पड़ा, अब तुम आराम से अपने घरवालों के लिए वक्त दे सकते हो, उनकी खुशियां और ग़म बांट सकते हो। और कैद में रहे इंसानो की फिक्र तुम्हें कबसे होने लगी? क्या तुमने कभी उन लोगों के बारे में सोचा जो पूरे-पूरे साल कर्फ्यू में रहते हैं? क्या तुमने उन मासूमों (बेगुनाहों) के बारे में सोचा जो झूठे इल्ज़ामो में बरसों से जेल की काल कोठरीयों में कैद है? ”

देखो ये हमारा जाति (निजी) मामला है, तुम इसमे दखल ना ही दो तो बेहतर होगा। तुम्हें तो इतना भी खयाल नहीं है कि तुम्हारे इस कहर से मिसकीनो (गरीबों) को दो वक्त की रोटी के भी लाले पड़ गए। ”

अरे वाह ! आपको और गरीबों की फिक्र! बात कुछ हजम नहीं हुई जनाब । मेरे आने से पहले, तुम अमीर इंसानो ने गरीबों के लिए कौनसा लंगर चला रखा था, बताना तो जरा? बल्कि इसमें भी मेरा ही अहसान मानो, जो ऐसे मौकों पर तुम्हें गरीबों को खाना देने के बहाने तस्वीरें खिंचवाने का बहाना मिल रहा है, वरना तो ग़रीब लोग हमेशा ही रहते हैं केवल तुम्हें, ऐसे वक्त ही दिखाई देते हैं। मैं तुम्हारी बातों का जवाब देना जरूरी नहीं समझता। हम खुदा से दुआ करेंगे कि जल्द से जल्द हमें तुम जैसे उफताद (मुसीबत) से निजात (छुटकारा) मिले? ”

अगर तुम्हें खुदा को याद करने का वक्त ही होता, तो ये नौबत ही क्यों आती ऐ, नादान इंसान। ये भी मेरा ही कहर मानो जो तुम, आज खुद के ही कर्फ्यू मे घिर गए और अब घर बैठे ठाले क्या करें तो चले इबादत ही कर ले। आज जो दिन - रात तुम्हारी नमाजे, दुआऐं (प्रार्थनाएँ) हो रही है ना, ये सब भी मेरी ही वज़ह से मुमकिन हो पाया है। वरना तुम्हें इतनी फरागत (फुर्सत) कहॉ। कुछ समझे बेवक़ूफ़ इंसान? ”

तो क्या तुम ये कहना चाहते हो कि हम इससे पहले खुदा को याद ही नहीं करते थे?”

तुम इंसानो जैसा कोई खुदगर्ज नहीं है दुनिया में । इससे पहले भी तुम खुदा को या तो सिर्फ ग़म में याद करते थे या फिर कोई दुआ कबूल कराने के लिए। आज मंदिर, मस्जिद, गिरिजाघरों में फिर से लोग पहुंच रहे हैं और दुआ कर रहे हैं, तो सिर्फ और सिर्फ खौफ से निजात पाने को।”

जाओ यार तुम! कैसी बेहूदा बातें करते हैं! तुम कुछ बुरे इंसानो के लिए सारी दुनिया के लोगों को बुरा नहीं कह सकते, समझे! ”

कुछ इंसान नहीं मिंया, यों कहिये की सिर्फ कुछ इंसान होंगे जो अपनी जिम्मेदारियों को समझते होंगे और दयानतदारी (ईमानदारी) से जिन्दगी जीते होंगे , ज्यादातर तो वैसे ही है जैसे में बयान कर रहा हूं।”

तो क्या तुम ये कहना चाहते हो कि, इंसानो के गुनाहों की वज़ह से ही खुदा ने तुम्हें हम इंसानो को खत्म करने के लिए भेजा है?”

अगर तुम ऐसा समझते हो तो ऐसा ही सही। मगर तुम्हें अपने इल्म (जानकारी) का दायरा वसीअ (विस्तृत) कर लेना चाहिए। और इन बातों पर गौर ओ फिक्र करना चाहिए कि आखिर, ये वबा क्योंकर (कैसे) वज़ूद मे आया ?आखिर मुल्क और गैर मुमालिक (दुनिया) में ऐसे कौन कौन से बिगाड़ हो रहे हैं जिनका ये नतीज़ा निकल कर सामने आ रहा है? क्या क्या हलाल और हराम (उचित और अनुचित) खाया जा रहा है और कैसे कैसे जिंदगियों को जिया जा रहा है? तुम जिस मजहब की चाहे किताब खोलकर देख लो, हमारे बारे में, तुम्हें कुछ ना कुछ सुराग मिल ही जाएगा। तुम्हें यह भी पता होना चाहिए कि, जब जब ज़मीन वाले जुल्म करेंगे तब तब खुदा अपने अजाब से ज़मीन वालों को मजा चखा देंगे…”

बस बस अपना इल्म अपने पास रखो! हम सब मिलकर तुम्हारा कोई ना कोई तोड़ निकाल ही लेंगे और तुम्हें पूरी दुनिया से नेस्तनाबूद (तबाह) कर देंगे।”

बस यहि तकब्बूर (घमंड) तो तुम्हें बर्बाद कर रहा है मेरे नादान दोस्त! तुम मुझे क्या मिटाओगे, तुम्हें तो इन्टरनेट (सोशल मीडिया) पर मेरे ऊपर जोक बनाने से ही फुर्सत नहीं है। मैं समझता था कि, जब मैं कहर बनकर तुम पर टूट पडूगां तो तुम, मुझसे हिफाजत के लिए शब व रोज़ (रात दिन) इबादतो मे मशगूल हो जाओगे और अपनी नींद हराम करके भी मेरा इलाज ढूंढ निकालोगे, लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ। तुम तो इतने लापरवाह हो कि तुम्हारी खुद की जिंदगी बचाने के लिए भी संजीदा(गम्भीर) नहीं हो। तुमसे तो तुम्हारी हुकुमतें(सरकारें) भी परेशान हैं, जिनकी ताअत (आज्ञा पालन) तक, तुम नहीं कर पा रहे हों और बातें करते तो मेरा इलाज ढूँढने की। जाओ मिंया जाओ ! तुम नहीं सुधरने वाले। ”

लगता है तुम, इंसानो को जरूरत से ज्यादा आलसी और निकम्मे खयाल करते हो?”

खयाल नहीं करता हज़रत, आप हो ही ऐसे। अपना जुमला (वाक्य) दुरुस्त कीजिए और इसमें आलसी, निकम्मे के साथ साथ खुदगर्ज, धोखेबाज, बेईमान, मक्कार वगैरह भी जोड़ लीजिए। ”

खबरदार जो अब एक लफ्ज़ भी और बोला तो! बेईमान हम नहीं, तुम हो, जो मासूम (बेगुनाह) लोगों को धोखे से हमला करके मार रहे हो।” मैं तो एक कहर हूँ जो एक तरफ से सब आम व ख़ास को बिना उम्र, व आमाल (कर्म) देखे अपने शिकंजे में ले लेता हूँ। लेकिन जरा अपनी तारिख(इतिहास) उठाकर तो देखो, पता चल जाएगा कि बेगुनाहों को धोखे से कौन मारता है। हम या तुम?”

फ़िलहाल तो तुम ही मार रहे हो बेवजह लोगों को । तुम हो कौन और चाहते क्या हो? आखिर मकसद क्या है तुम्हारा जो इस तरह कत्ल ए आम मचा रखा है?”

इतना क्यों बिगड़ते हो यार। मैं तो तुम इंसानो के बीच की नफरत का नतीज़ा हूँ। समझने की कोशिश क्यों नहीं करते, मुझे तुम लोगों ने ही पैदा किया है। तुम लोगों ने इंसान होकर भी इंसानो के बीच में जहर घोलने का काम किया है। कभी मजहब के नाम पर, तो कभी काले गोरे के नाम पर, कभी सियासत(राजनीति) के नाम पर, तो कभी तर्के (सम्पत्ति) को लेकर। मुझे हर कंही तलाश करने की जगह अपने दिलों में ढूंढो मेरे भाई। मैं तो तुम लोगों के बीच जो दूरिया बढ़ गई थी, उन्हें ही मिटाने आया हूँ। मोहब्बत का पैगाम लेकर आया हूँ। इससे कब्ल (पहले) भी मेरे कईं भाई तुम इंसानो के बीच आकर तुम्हें एक करने की कोशिश कर चुके हैं, लेकिन तुम ठहरे मतलबी के मतलबी, जब तक हम जैसे वबा (वाइरस) तुम्हारे बीच मौजूद रहेंगे, तब तक तुम पूरी दुनिया के लोग एक हो जाओगे और भाई के जैसे रहोगे । जैसे ही हम चले जाएंगे तुम कल से फिर उसी तरह एक दूसरे की जान के दुश्मन बन जाओगे।”

पूरी दुनिया में इतने बेगुनाहों को मारकर तुम हमें एक करने आए हों?”

कोई भी जंग हो, कुर्बानी तो देनी ही पड़ती है भाई साहब। फिर तुम इंसानो को छोटे मोटे कहर से तो कोई फर्क़ ही नहीं पड़ता। बहुत ही ढीठ किस्म के जो हो तुम।”

मतलब तुम्हें लगता है कि तुम्हारे इस जुल्म की वजह से हम सब एक हो जाएंगे?”

भाड़ में जाओ तुम और भाड़ मे जाए तुम्हारी दुनिया। कमाल करते हो यार! अब ये सवाल भी मुझसे ही करोगे क्या? मैं तो मेरा काम करके आज नहीं तो कल चला ही जाऊँगा फिर तुम जानो और तुम्हारी दुनिया… वैसे तुमसे हुज्जत (बहस) करने का कोई फायदा भी नहीं है। मुझे नहीं लगता कि तुम इंसान कभी सुधरने का इरादा भी रखते होंगे।”
लेखक एंव अनुवादक
नासिर शाह (सूफी)


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