चाय के दीवाने (कविता गेस्ट ब्लॉगर सुनील कुमार मीणा, Ph.D स्कॉलर)

Sufi Ki Kalam Se

चाय के दीवाने”

चाहे तू घर की हो या थड़ी की उबलती हो ,
या किसी स्टेशन के अनजाने गलियारे की,
तेरी चुसकियों की चाहत से ख़ुद को दूर नहीं कर पाता हूँ ।
में चाय का परवाना हूँ ,तेरे बिना ख़ुद से मुलाक़ात नहीं कर पाता हूँ।
जब टकराता हूँ तेरी गर्माहट से , तो चढ़े बुखार को कोसों दूर छोड़ आता हूँ

बदलती रहती है तू लिबास, कभी डिस्पोजल का तो कभी काँच का, तो कभी मिट्टी के कुल्लड़ का,
पर तेरे लिए तड़प, हर नए लिबास में और नई नई पाता हूँ,
तू मोहब्बत है या मीठा ज़हर,
में तेरे साथ ही यहाँ से अलविदा लेना चाहता हूँ ।

Sunil kr Meena
Ph.D Scholar

चाय के दीवाने
Sunil kr Meena
Ph.D Scholar


Sufi Ki Kalam Se

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