“चाय के दीवाने”
चाहे तू घर की हो या थड़ी की उबलती हो ,
या किसी स्टेशन के अनजाने गलियारे की,
तेरी चुसकियों की चाहत से ख़ुद को दूर नहीं कर पाता हूँ ।
में चाय का परवाना हूँ ,तेरे बिना ख़ुद से मुलाक़ात नहीं कर पाता हूँ।
जब टकराता हूँ तेरी गर्माहट से , तो चढ़े बुखार को कोसों दूर छोड़ आता हूँ
बदलती रहती है तू लिबास, कभी डिस्पोजल का तो कभी काँच का, तो कभी मिट्टी के कुल्लड़ का,
पर तेरे लिए तड़प, हर नए लिबास में और नई नई पाता हूँ,
तू मोहब्बत है या मीठा ज़हर,
में तेरे साथ ही यहाँ से अलविदा लेना चाहता हूँ ।
Ph.D Scholar
चाय के दीवाने
Sunil kr Meena
Ph.D Scholar
Warmth of words…waao super written!
So nice and exhilarating 👍👍👏👏👏👏