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Sufi Ki Kalam Se

अंतर्मन से पुकारते पहाड़, मैंने बहुत बार सुना हैं कि पहाड़ों पर जाकर लोग खो जाते हैं,जबकि यहीं वह जगह हैं जहां कोई स्वयं को सबसे ज्यादा पा सकता हैं।। मेरे लिए पहाड़ों पर जाना जैसे ख़ुद से मिलना है।
वहां जाकर महसूस होता है एक ठहराव, हां वही ठहराव जो मुझे तुम्हारे स्पर्श से मिलता हैं मुझे, वहां के लोगो की ज़िंदगी में कितना ठहराव है। पहाड़ को काट कर बनाई गई सड़के और उस पर सभ्य तरीके से चलती हुई गाड़िया। यहां कोई जल्दबाजी नही करता। यहां लोग सादगीपूर्ण जीवन जीते हैं क्योंकि सच्ची प्रकृति के समीप किसी झूठे चका चौंध की आवश्कता ही नहीं हैं।।


हमारे यहां लोग एक अदद घर की इच्छा में पूरी जिंदगी खर्च कर देते है जबकि पहाड़ी लोग अपने छोटे छोटे घरों में ही खुश रहते है, उन घरों में रात्रि को पीली पीली लाईट,चांद की दूधिया रोशनी में यू जगमग करती हैं मानो हरियाली के आसमां में तारें झिलमिल करते हों।
मैं जब झील किनारे बैठी तो लगा जैसे मन भी लहरों की भांति हिलोरे खा रहा हो,लहरों के साथ गोते लगाती हुई भावनाएं ।।
मनुष्य के हृदय में प्रेम हमेशा ही सतत और निरंतर बहता रहता है न जाने कब कौनसी लहर अपने सागर से जा मिले? बहुत बार बहुत से लोगो से मिलकर मेरे ह्रदय में प्रेम उमड़ा था किंतु वो क्षणिक था जो खत्म भी कुछ क्षणों में ही हो गया था।


प्रेम का असली ज्वार तो तुमसे मिलने के बाद ही उमड़ा हैं और तब से यह सतत चलने वाली प्रक्रिया बन गई है, मेरे हृदय में तुम्हारे लिए असंख्य, अनंत भावनाएं हैं ठीक इस झील की लहरों समान। जो तुम्हारे संग मात्र से ठहर जाती हैं।
सोचती हूं कालांतर में अगर तुम इन लहरों के समंदर नही बन पाए तो क्या होगा ??
हरियाली ओढ़े पहाड़ों की कतारें…..l
जैसे रंगी हैं प्रेम से मन की दीवारें।।

फिर क्या,,?? जमीं हुई बर्फ़ के समान ही मेरे अवचेतन/अचेतन में जम जाएगी ये यादें?? गोया कि मनुष्य के अचेतन मन में अधूरी और दमित इच्छा दफन रहती है है।
सम्भव है कि फिर कभी याद रूपी किरण की तपिश से जमी हुई लहरें अपना समन्दर खोजने निकल पड़े? और अंततः तुम्हें भी सागर होना ही पड़े ।जैसे सूरज की तपन से पहाड़ों पर ज़मी बर्फ भी पिघलने लगती है।
याद आती है Daylon Thomas की पंक्तियाँ….
Light breaks where no sun shines…
Where no sea runs. The water of the hearts, push in there tides……

गेस्ट ट्रैवल ब्लॉगर ज्योति नारनोलिया

@ज्योति नारनोलिया

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