राजनीतिक हासिये पर पहुंच चुके पूर्व मंत्री दुर्रु मियां को अपने आपको फिर से स्थापित करने के लिये एक दफा मुसलमान फिर याद आये
(गेस्ट ब्लॉगर अशफ़ाक कायमखानी का ब्लॉग)

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राजनीतिक हासिये पर पहुंच चुके पूर्व मंत्री दुर्रु मियां को अपने आपको फिर से स्थापित करने के लिये एक दफा मुसलमान फिर याद आये।
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जयपुर


जनता के मध्य रहकर उनके दुख सुख मे भागीदार बनने की बजाय महलो मे रहकर राजनीति के किसी समय सिरमोर बनने के प्रयाय माने जाने वाले पूर्व मंत्री नवाब ऐतमादुद्दीन खान उर्फ दुर्रू मियां आखिर कार राजनीति मे हासिये पर पहुंचने के बाद अपने आपको एक दफा फिर से स्थापित करने की कोशिश मे उन्होंने अपने जयपुर स्थित लुहारू हाउस निवास पर मुस्लिम समुदाय के प्रतिनिधियों की अहम बैठक आयोजित करके कांग्रेस सरकार पर दवाब बनाने की भरपूर कोशिश करने के बावजूद उनके वजूद को कोई मजबूती फिलहाल मिलती दूर दूर तक नजर नही आ रही है।
दुर्रू मियां द्वारा आयोजित उक्त बैठक मे पूर्व केन्द्रीय मंत्री व कांग्रेस नेता सलमान खुर्शीद विशेष रुप से मोजूद रहे। वहीं राजस्थान भर मे अनेक मुस्लिम समुदाय के लोगो को दुर्रू मियां द्वारा टेलफोनिक निमंत्रण देकर बैठक मे आमंत्रित करने के बाद भी ठीक ठाक भीड़ नही जुटने से दुर्रू मियां के ऐजेण्डे को कोई खास ताकत मिलती नजर नही आ रही है।


दिल्ली मे मोदी सरकार बनने के बाद से लेकर आज तक उसकी नितियों को लेकर मीडिया व अन्य जरायो के मार्फत एक शब्द भी बोलने की हिम्मत नही जुटाने वाले दुर्रू मियां की कांग्रेस मे किसी जमाने मे उंची पहुंच जरूर हुवा करती थी। उनके बहनोई जुल्फिकार खान व बहन नूरबानो रामपुर यूपी से अनेक दफा सांसद रहे। पर जब से रामपुर की राजनीति मे आजम खान का उदय हुवा तब से नूर बानो के हाथ जीत नही लगी है। इसके साथ नवाब होने के कारण कांग्रेस के ऊंचे तबके मे रसुकात होने के अलावा अशोक गहलोत की मेहरबानी से वो एक दफा राज्यसभा के सदस्य भी चुने गये थे। लेकिन उन्होंने आज तक आम मुस्लिम व आम आदमी के मध्य रहकर राजनीति नही की। जिसके कारण ही वो आज अलग थलक पड़े नजर आ रहे है।
हालांकि यह सत्य है कि राजस्थान मे अशोक गहलोत के नेतृत्व मे गठित कांग्रेस सरकार की शुरुआत से लेकर अबतक मुस्लिम समुदाय के सत्ता मे भागीदारी को लेकर उन्हें दरकिनार किया जा रहा है।लेकिन इस सम्बंध मे कुछ सामाजिक व शेक्षणिक संगठनों के अलावा किसी भी राजनेता के जबान से एक शब्द तक नही निकल पाया है। मुख्यमंत्री गहलोत लगातार अपनी मन मर्जी करते हुये सरकार चला कर मुस्लिम समुदाय को आयना दिखाते आ रहे है। उर्दू व मदरसा पैराटीचर्स की मांगो को लेकर विधानसभा के बाहर उर्दू शिक्षक संघ व मदरसा पैराटीचर्स संघ ने सामाजिक संगठनों के साथ मिलकर लगातार आंदोलन करके सरकार को घेरा है। वही विधानसभा के अंदर निर्दलीय विधायक संयम लोढा व कांग्रेस विधायक हरीशचंद्र मीणा सहित कुछ विधायकों ने दमदारी के साथ उक्त मुद्दे को उठाकर सरकार को घेरा है। पर अधीकांश मुस्लिम नेता विधानसभा के अंदर व बाहर उक्त मुद्दे से दूर रहना ही बेहतर समझा।


दुर्रू मियां द्वारा के जयपुर निवास पर आयोजित कल की मुस्लिम समुदाय की बैठक मे अन्य जिलो के मुकाबले जोधपुर व कोटा से लोग अधिक आना बताया जा रहा है।उक्त बैठक मे शिरकत करने वाले खास जनप्रतिनिधियों व नेताओं पर नजर डाले तो पाते है कि पूर्व मंत्री व पूर्व सांसद अश्क अली टांक थे। जिन्होने 1985 का पहला विधानसभा चुनाव फतेहपुर से लड़कर विधायक बने। उसके बाद लगातार वो विधानसभा चुनाव हारते हा रहे है। बीच मे अशोक गहलोत के कारण एक दफा वो राज्यसभा मे जाने मे जरूर सफल रहे है। दुसरे प्रमुख व्यक्ति पूर्व विधायक मकबूल मण्डेलीया थे। जिन्होने भी चूरु से एक दफा विधानसभा चुनाव जरुर जीता लेकिन उसके बाद वो चुनाव हारे एवं उनके पूत्र रफीक भी विधानसभा व लोकसभा का चुनाव हार चुके है। रफीक मण्डेलीया अभी तक एक भी चुनाव जीत नही पाये। इनके अतिरिक्त विधायक रफीक खान, विधायक आमीन कागजी व विधायक हाकम अली ने भी शिरकत की। जो पहली दफा विधायक बने है। इनके अलावा अन्य जगहों के अतिरिक्त जोधपुर से भी कुछ लोगो ने बैठक मे शिरकत की जो मुख्यमंत्री के करीबी माने जाते है। इसी के मध्य एडवोकेट शरीफ खान ने सलमान खुर्शीद ने मांग पत्र सोंपा एवं भादरा से आये एक शख्स ने कुछ जनरल डिमांड रखी तो लोग सख्ते मे आ गये।
कुल मिलाकर यह है कि महलो के धनी व केवल चुनाव के समय राजनीति करने वाले पूर्व मंत्री दुर्रू मियां ने अपने आपको राजनीतिक हासिये से निकालने के लिये अपने आपको फिर से स्थापित करने के लिये कांग्रेस नेता सलमान खुर्शीद की मोजूदगी मे मुस्लिम प्रतिनिधियों की बैठक करने से उनको राजनीतिक लाभ कितना मिल पाता है यह तो भविष्य बतायेगा। लेकिन राजनीतिक पटल मे काफी समय अदृश्य रहने के साथ साथ मोदी सरकार व भाजपा के खिलाफ किसी भी तरह से ब्यान तक नही देने के चलते उनका जीक्र अक्सर होता रहता है। वेसे दुर्रु मियां द्वारा अपनी पूत्रियो के रिस्तै मजहब की दिवारो को तोड़कर करने के कारण उन्हें सेकुलर नेता के तौर पर जाना जाता है।

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