एंटीना (इंशाइया/शॉर्ट ऐस्से)

Sufi Ki Kalam Se

एंटीना

“अरे इधर घुमाओं..
नहीं उधर नहीं, इधर घुमाओ इधर,
क्या कर रहे हो.. ठीक से घुमाओं न”

“अब ठीक है? “

“नहीं थोड़ा सा और टर्न करो हल्का सा, बिल्कुल एक पॉइंट..”

“अब देखो? “

“हाँ अब ठीक है लेकिन हल्की धारियां आ रही है और फोटो हिल रहे हैं”

“अब?”

“हाँ अब ठीक है, आ जाओ”

” रुको रुको,…. प्लीज़ रुको, तुम्हारे छोडते ही फिर से सब खराब हो गया प्लीज ऐसे ही पकड़े रहो, सचिन ने चौका मार दिया है…”

अरे यार, मुझे भी तो देखना है इससे पहले वाले मैच में भी, मैं एन्टिना ही पकड़े रहा और सचिन आउट होकर चला गया। अब तुम आओ ऊपर और तुम पकड़ो इसे, मैं नीचे आकर सचिन की बैटींग देखता हूं।”

“तुम कहां मैच देखते हो ज्यादा, तुम तो शक्तिमान देखते हो ना, एक काम करो आज तुम मुझे सचिन की बैटींग दिखा दो फिर कल में शक्तिमान दिखा दूँगा तुम्हें। ठीक है न?”

” हाँ, ये ठीक है, लेकिन तुम अपना वादा याद रखना, कल अपनी बात से मुकर मत जाना “

” हाँ ठीक है।”

कहते हुए एक भाई सचिन की बैटींग देखने लगा और दूसरा भाई धूप में एंटीना पकड़े खड़ा रहा। अगले दिन मैच देखने वाले भाई ने एंटीना पकड़ा और दूसरे ने शक्तिमान देखा।
वो दिन भी क्या ही दिन थे ना, जब आपसी भाईचारा, त्याग और समर्पण देखने को मिलता था। उस दौर की तुलना आज से करे तो सबकुछ बदला हुआ मिलता है।
उस दौर में एंटीना को पकड़ कर मनोरंजन किया जाता है और आज देखे तो उसी आधुनिक एंटीना ने हमे ना सिर्फ पकड़ लिया है बल्कि बुरी तरह से जकड़ लिया है। परिवर्तन की इस दुनिया में, आधे घंटे के काम के लिए, आधुनिक एंटीना रूपी युग में कब दो से तीन घंटे बर्बाद हो जाते हैं, पता ही नहीं चलता। फिर भी हमारा काम पूरा हो जाए ये जरूरी नहीं होता। इंसान अपना ज्यादातर समय इस आधुनिक एंटीना रूपी दुनियां को देता है फिर भी ना वह ठीक से कोई फिल्म देख पाता है और ना ही सीरिअल, मैच तो वो सिर्फ ख़बरों या हाइलाइट्स में ही देखता है। आधुनिकीकरण के इस परिवर्तनशील युग में त्याग और समर्पण की उम्मीद रखना तो एक तरह से बेईमानी होगी। कोई सगा भी हो, तो भी आज का मानव अपनी मुफ्त की कुछ एमबी देने में भी ऐसा हिचकिचाता है जैसे कोई जायदाद मांग ली गई हो।
वाह रे मानव! पुराने एंटीना की जगह आधुनिक एंटीना तो स्वीकार कर लिया लेकिन आपसी भाईचारा, एकता, त्याग और समर्पण की भावना को कई पीछे छोड़ आया है।

नासिर शाह (सूफ़ी)


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