ज़रूरत पड़ने पर राजनीति में भी जाऊँगा, 30 सितंबर तक नियमित हो जाएंगे संविदा कर्मी – ठाकूर शमशेर खान भालू (गाँधी) का एक्सक्लूसिव इंटरव्यू सिर्फ सूफ़ी की कलम से पर।

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ज़रूरत पड़ने पर राजनीति में भी जाऊँगाशमशेर भालू
30 सितंबर तक नियमित हो जाएंगे संविदा कर्मी – शमशेर भालू
ठाकूर शमशेर खान भालू (गाँधी) का एक्सक्लूसिव इंटरव्यू सिर्फ सूफ़ी की कलम से पर।



सूफ़ी – शमशेर खान साहब, सबसे पहले तो हम आपकी नयी पहल (दांडी यात्रा) के लिए मुबारकबाद पेश करते हैं जिसके तहत आपने एतिहासिक गांधी वादी तरीके से प्रदर्शन का रास्ता चुना। अब आप हमे बताये कि ये आइडिया आपको कैसे आया जबकि प्रदर्शन के नाम पर तो लोग हिंसात्मक तरीके का सहारा लेते हैं?

शमशेर खान – 2 सितम्बर के डायरेक्टर साहब के आदेश के बाद हम बिल्कुल हिम्मत हार गये थे। घर पर निराश बैठे कुछ  प्लानिंग सोच रहे थे, अहलिया साहिबा पास बैठी थी। उस से पुछा क्या किया जाना चाहिये तो उन का जवाब था “अब क्या आप दांडी जाओगे” बस इन्ही अल्फ़ाज़ ने यह नया काम दे दिया इसी दिन से काम शुरू किया और तकरीबन 2 माह की स्टडी के बाद काम शुरू किया। अब कामयाब रहे या नाकामयाब रहे अल्लाह बेहतर जनता है।
मंज़िल करीब है
चलना ज्यादा है
थक ना जाना
रुक ना जाना
कितनों का हौसला हो
कइयों की उम्मीद
ए रहबर कॉम के
तू रुकना मत
तू थकना मत
कांटे होंगे रास्तों में
तपन होगी खूब
जलन सीने में होगी
अगन मन में होगी
पर हारना नहीं
पैर पसारना नहीं
टूटने लगे हिम्मत
पुकारना अपनों को
खुली आँखे रखना
देखना सपनों को
जीनत है तू यारों की
किस्मत दिलदारों की
सदा सुन हरकारों की
शान तू सरदारों की
बीर मेरे दबना नहीं
अब तू रुकना नहीं।।



सूफ़ी – माशाल्लाह, आपका खयाल अच्छा था और आप इसे प्रभावी रूप से अमल मे भी लाए। हमने देखा था कि कुछ ही दिनों में लोग आपमें गांधी का अक्स देखते हुए फॉलो भी करने लगे थे, सोशल मीडिया पर हर जगह आप ही आप छाए हुए थे, लेकिन फिर अचानक ऐसा क्या हुआ? जिससे सारी उम्मीदे टूटती सी दिखाई देने लगी? लोगों का मानना था कि शमशेर भाई अब नहीं रुकने वाले। फिर आपने उन सबकी उम्मीदों को कैसे तोड़ दिया?

शमशेर खान – मंज़िल करीब है..
……………
अब तू रुकना नहीं।

सूफ़ी – शानदार नज्म है लेकिन हम अब भी आपके जवाब का इंतजार कर रहे हैं? बराए मेहरबानी सवाल का जवाब दे, राजस्थान की जनता को आपके इस जवाब का इंतजार है।

शमशेर खान – यात्रा अल्पभाषाओं के संरक्षण के लिये थी। हमारी सरकार से जो मांगे थीं उन पर सहमति बन गई सरकार ने वार्ता का फार्मूला दिया उस के अनुसार हम वार्ता के लिये तैयार हुये। मक़सद चलना नहीं, बात मनवाना था। इस मकसद में विभाग पहले जो कहता था कि उसने अल्पभाषाओं के विरुद्ध कुछ नहीं किया अब अपने स्टाफिंग पैटन नें संसोधन करने के लिये राज़ी हो गया इस का नतीजा आप को 19.01.2021 के आदेश से मिल गया। हम जो चाहते थे उस से बढ़कर काम भी हुआ।
राज्य के इतिहास में 700 +उर्दू की मिडल स्कूल लेवल पर कभी पोस्ट नहीं हुई आज हो चुकी हैं व काम अभी भी जारी है जो 2000 पर होने की संभावना है।
अभी माध्यमिक शिक्षा का काम चालू है जो जून तक पूरा होगा।
अल्पभाषा प्रकोष्ठ का काम भी पूरा हो चुका है।
संविदा रिपोर्ट तैयार है जल्द तय समय पर काम होने की पूरी उम्मीद है। हमारा मकसद मीडिया पर छाने या शोहरत का नहीं काम का था जो हो गया है, हो रहा है।
उम्मीद पर दुनिया कायम है जो काम हाथ में लिया है उस के पूरा होने तक संघर्ष जारी है आज भी,कल भी रहेगा।
नज़्म के मुताबिक अभी रुके नहीं हैं काम व संघर्ष जारी है। संघर्ष कुछ विचारधाराओं से भी है ओर सरकार व व्यवस्था से भी। सरकार से जनता से जुड़े मुद्दों पर दो दो हाथ करने के लिए हरदम तैयार, पर अड़ियल रवैये की बजाय वार्ता व समझौतावादी नीति का पालन करते हुए।

सूफ़ी – आपका मक़सद सिर्फ उर्दू भाषा को बढावा देने का था या मदरसा पैराटीचर्स के नियमितीकरण का भी था? आपने कहा कि संविदा कर्मियों की रिपोर्ट तैयार हो रही है लेकिन आप भी जानते होंगे कि हर साल, हर सरकारें संविदा कर्मियों की रिपोर्ट तैयार करती रही है तो ऐसा क्या तैयार करती है सरकार जो पिछले दस सालों में भी कोई सरकार इनकी रिपोर्ट तैयार नहीं कर सकीं?



शमशेर खान – पहली बात आप को जैसे ऊपर बताया अल्पभाषा कि मामला बड़ा संगीन मामला था। रोज़ कोई मंत्री-नेता आते तो ज्ञापन-ज्ञापन का शगल रहता।
इस से परेशान हो गए थे। इस के साथ ही संविदा कर्मचारियों की हालत खराब थी जो लॉकडाउन काल मे ओर खराब हो गई।
इस के साथ 15 सूत्री प्रोग्राम के खराब हालत के बारे में  भी सोचा। इस से पहले संविदा कर्मियों के बारे में आज तक कोई रिपोर्ट सरकार तक नहीं पहुंची। बस कमेटी की बैठक ही होती थीं। पहली बार आप भी जानते हैं डेट निश्चित हुई और जल्द इस का शानदार अंजाम देखने को मिलेगा। 10 सालों में सिर्फ आश्वासन दिए गए जो अब लिखित तारीख में तय किया गया है।

सूफ़ी-क्या आपको यकीन है कि इस बार की  रिपोर्ट तैयार कर सरकार, संविदा कर्मियों को नियमित कर देगी यदि हाँ तो ये कब तक हो जाएगा ?

शमशेर खानबिल्कुल, 30 सितम्बर

सूफ़ी – उम्मीद करते हैं कि 30 सितम्बर तक हज़ारों संविदा कर्मियों को खुश खबरी मिल जाए।
शमशेर साहब, उसके बाद अगर हम यह समझे, की आप सक्रिय राजनीति में उतरने वाले हैं? तो क्या सही होगा?


शमशेर खान – शुक्रिया

सूफ़ी – जो अवाम में बाते हो रही है वही सवाल आपसे पूछा है। तो आप भी बता दीजिए ना, की यह सही है या नहीं?

शमशेर खान – आप बताये, क्या राजनीति में आना चाहिए या नहीं? अगर ज़रूरत पड़ी व अपने लोगों ने मांग की तो राजनीति से गुरेज नहीं। हालांकि यह अवाम पर निर्भर करता है। फ़िलहाल राजनीति में जानें का कोई इरादा नहीं है। हा वक़्त आने पर  अपनों की सलाह पर फैसला लिया जा सकता है। अगर आवाम कहेगी तो इस अंधे कुवें में उतरने को तैयार हूँ।
आपको क्या लगता है,
ऐसा किया जाना चाहिए या नही?

सूफ़ी – मैं राजनीति के बारे में ज्यादा जानकारी नहीं रखता इसलिए आपको मशवरा देने मे सक्षम नहीं हूँ। अब आप बताये, अगर आपकी नजर में राजनीति अंधे कुंए की तरह है तो फिर आप इसमे क्यों उतरना चाहते हैं?

शमशेर खान – कहते हैं गन्दगी साफ करनी है तो उस में उतरना पड़ता है ऐसी कोशिश जरूर करनी चाहिए। अगर ताकत हो तो मसले आसानी से हल किए जा सकते हैं।

सूफ़ी – आपके अनुसार अगर राजनीति एक अंधा कुंवा है तो फिर इसमें क्यों उतरना चाहते हैं आप?

शमशेर खान – जी आपकी बात से में मुत्तफ़िक़ हु। पर सब जगह ऐसा नहीं होता। मिलनसार होना अलग बात है, आवाम के काम करवाना अलग। आप अगर मेरे वालिद साहब के बारे में पढ़-सुन लेंगे तो सब साफ हो जायेगा। आज मनीष सिसोदिया, अरविंद केजरीवाल इस के उदाहरण हैं।

सूफ़ी – मनीष सिसोदिया और अरविन्द केजरीवाल का नाम लेना कहीं आपके आम आदमी पार्टी से चुनाव लड़ने का संकेत तो नहीं है या फिर किस पार्टी में जाने का मन है, ये भी स्पष्ट कर दे?

शमशेर खान – ऐसा नहीं है मेरी विचारधारा स्थिर है पर उन के काम करने के ढंग से प्रभावित हूँ। पार्टी कोई ना कोई तो सब की होती है, प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष।

सूफ़ी – माफी के साथ यह सवाल पूछ रहा हूं शमशेर साहब, कई लोग आपके लिए ‘फ़र्जी गाँधी’ जैसे शब्दों का प्रयोग कर कह रहे हैं कि आपने ये सब आपकी राजनीति चमकाने के लिए किया है? इस बारे में क्या स्पष्टीकरण है आपका?

शमशेर खानकुछ  तो लोग कहेंगे लोगों का काम है कहना
छोड़ो बेकार की बातों को
तुम मेरे हो ना।
यही लोग कल जयजयकार भी करेंगे। वक्त का इंतजार करे। दूसरी बात आप कह रहे हैं कुछ।
कुछ को मानते हैं या ज्यादातर को। ज्यादातर लोग क्या कहते हैं यह भी मेंशन करें। कल ही सत्य के साथ एक प्रयोग किया और सफल रहा।
रब का करम है। आगे आगे देखिते जाइये, आपको भी फख्र होगा इंशा अल्लाह।

सूफ़ी – आपने आपकी दांडी यात्रा मे मदरसा पैराटीचर्स को शामिल क्यों नहीं किया? क्या वो खुद शामिल नहीं हुए या आपकी चमक पर कोई फर्क़ पड़ता इसलिए आपने उनसे मना किया?
शमशेर खान -हम ने सभी के मुद्दे शामिल किए है। काफी मुद्दों को हल होने में साल भर लगेगा। अभी 1%सफलता ही मिली है। उर्दू पंजाबी गुजराती सिंधी व संस्कृत के ओर पद बढ़ेंगे। अभी मदरसा बोर्ड का काफी काम बाकी है जो यहां बयान नहीं किया जा सकता है।

सूफ़ी – आप मेरे सवाल से बचने की कोशिश कर रहे हैं? पैराटीचर्स खुद यात्रा मे शामिल नहीं हुए या आपने नहीं किया? अगर आपने नहीं किया तो क्यों?

शमशेर खान – जो आये उन का इस्तक़बाल जो नहीं आ सके उन को अल्लाह हिदायत दे।

सूफ़ी – मतलब कोई  पैराटीचर्स शामिल नहीं हुए सिर्फ शामिल होने की औपचारिकता पूछकर चले गए?

शमशेर खान – पैरा टीचर की एक समस्या है।
काम चाहिये पर घर बैठे। हम ने काफी कोशिश की उन को आवाज भी दी पर शायद उनको पुरी तरह से सुनाई नहीं दिया या उनको भरोशा नहीं था कि ऐसा हो सकता है। शायद बार बार मिली असफलता से वो निराश हो गए। अब भी 5 से 10% को भरोसा नहीं है। जबकि इंशाअल्लाह उन का काम होगा।
संविदाकर्मियों के मामले में राजनीति ज्यादा काम कम हुआ।
सही बात तो यह है कि 38 हजार लोगों की बड़ी संख्या होने के बाद भी वो एक जगह होकर आज तक लड़ने में असमर्थ रहे हैं।
अलग-अलग संगठन अलग-अलग लड़ रहे हैं जिस से बात सही ढंग से सही जगह पहुंची ही नहीं।

सूफ़ी – अब आप इस सवाल पर खुलकर बोले। यह बात भी सब जानना चाहते थे, कि जिनके लिए इतना संघर्ष किया जा रहा है वह क्यों इतने निष्क्रिय रहे।
हमारे सभी सवालों का आपने बेबाकी से ज़वाब दिया इसके लिए हम आपके आभारी हैं शमशेर साहब, लेकिन आपके द्वारा संविदाकर्मियों को नियमित करने की बताई गई डैडलाइन 30 सितम्बर, को आपसे फिर सवाल पूछा जाएगा। उम्मीद करते है कि आप और हम फिर से मुखातिब होंगे । एक बार फिर से आपका शुक्रिया। अब इजाजत चाहेंगे।

शमशेर खान – जी शुक्रिया।

जीवन परिचय – ठाकुर शमशेर खान

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